आज हम ऐसे युग में जी रहे हैं जहाँ पर्यावरण का नुकसान सबसे तेज़ गति से हो रहा है। पिछले 150 सालों में पृथ्वी का तापमान 1.1 डिग्री बढ़ा है क्यूंकि Co2 (कार्बन डाइऑक्साइड) और मीथेन गैस जैसे ग्रीनहाउस गैस की मात्रा हमारे पर्यावरण में तेज़ी से बढ़ रही है और यह जलवायु परिवर्तन के सबसे बड़े कारणों में से एक है। 

जलवायु परिवर्तन मुख्य रूप से दो कारकों की वजह से होता है, पहला है प्राकृतिक कारक और दूसरा है इंसानी गतिविधि। प्राकृतिक कारक तो हमारे हाथों में नहीं है लेकिन इंसानी गतिविधि हम ही निर्धारित करते हैं। 

शोध के अनुसार अगर जलवायु परिवर्तन के रोकथाम के लिए जरुरी कदम समय रहते न उठाया गया तो अत्यधिक गर्मी, सूखा, बाढ़, तूफान, समुद्र का बढ़ता स्तर इन सभी मुसीबतों को हमें झेलना पड़ सकता है। 

पशु उद्योग लगभग 14.5% ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन का कारण है। माँस, डेयरी, अंडे, चमड़े, इत्यादि का उत्पादन किया जा सके इसलिए पशु उद्योग जानवरों की खेती करता है परिणामस्वरूप बड़ी मात्रा में ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जित होती है।  

विश्व आर्थिक मंच के अनुसार वर्तमान में मनुष्यों को खिलाने के लिए पशु उद्योग में लगभग 19 अरब मुर्गियाँ, 1.5 अरब गाय, 1 अरब भेड़ और 1 अरब सूअर पाले जा रहे हैं। इतनी बड़ी मात्रा में पशु खेती की वजह से हमारे पृथ्वी पर कई बुरे प्रभाव पड़ रहे हैं। 

पर्यावरण पर पशु खेती का प्रभाव

पृथ्वी पर कई सारी आपदाएँ हैं जिसमें पशु उद्योग का बड़े पैमाने पर योगदान है। 

जलवायु परिवर्तन 

जलवायु परिवर्तन का अर्थ है पृथ्वी के तापमान और मौसम में होने वाला बदलाव। पृथ्वी के तापमान बढ़ने का सबसे बड़ा कारण हैं ग्रीनहाउस गैस जैसे – कार्बन, मीथेन, नाइट्रोजन इत्यादि और 14.5% ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन का कारण खुद पशु उद्योग है। 

The Guardianके अनुसार पशु कृषि, मानव निर्मित ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में दूसरा सबसे बड़ा योगदानकर्ता है। हम जो खा रहे हैं वह हमारी धरती को विनाश की ओर ले जा रहा है। 

  • 2030 तक जलवायु परिवर्तन अपरिवर्तनीय हो सकता है।
  • ग्रीनहाउस गैस का स्तर सर्वकालिक उच्च स्तर पर है।
  • 10 लाख से अधिक प्रजातियां विलुप्त होने के कगार पर है।
  • सभी कार्बन उत्सर्जन का लगभग 50% दुनिया के सबसे अमीर 10% आबादी द्वारा उत्सर्जित किया जाता है।
  • पिछले 30 वर्षों में दुनिया के आधे कोरल रीफ की मृत्यु हो गई है, और ग्रेट बैरियर रीफ के दो तिहाई कोरल रीफ क्षतिग्रस्त हो गए हैं – यह तब होता है जब समुद्र का तापमान बहुत अधिक होता है।
  • यदि हम अपने उपभोग की वर्तमान दर पर पृथ्वी के संसाधनों का उपयोग करना जारी रखते हैं, तो हमें पृथ्वी के पारिस्थितिक तंत्र (इकोसिस्टम) की मांग का समर्थन करने के लिए 1.7 पृथ्वी की आवश्यकता होगी।

संयुक्त राष्ट्र के जलवायु वैज्ञानिकों ने अनुमान लगाया है कि ग्लोबल वार्मिंग को 1.5 डिग्री सेल्सियस से नीचे रखने के लिए हमारे पास केवल साल 2030 तक का समय है। यदि हम अपने तौर-तरीकों में सुधार नहीं करते हैं तो हमें अपने जीवनकाल में ज्यादातर सूखा, बाढ़ और अन्य चरम तापमान परिवर्तन देखने को मिल सकते है।

मीथेन, कार्बन डाइऑक्साइड की तुलना में गर्मी को फँसाने वाली गैस के रूप में 28 गुना अधिक शक्तिशाली है। पशु मल ‘नाइट्रस ऑक्साइड’ के सबसे बड़े योगदानकर्ताओं में से एक है, यह गैस कार्बन डाइऑक्साइड की तुलना में 296 गुना अधिक घातक है। सरल शब्दों में कहूँ तो हम जितना अधिक दूध, माँस, अंडे, चमड़ा, ऊन, रेशम जैसे पशु उत्पादों पर निर्भर होते हैं, उतनी ही अधिक ग्रीनहाउस गैसें वातावरण में एक असामान्य दर से उत्सर्जित होती है।

मुंबई मिरर की एक लेख में क्लाइमेट सेंट्रल, न्यू जर्सी के ‘स्कॉट-ए-कुल्प’ और बेंजामिन एच स्ट्रॉस द्वारा किए गए एक अध्ययन की रिपोर्ट पब्लिश की गई थी, जिसके अनुसार 2050 तक मुंबई के अधिकांश क्षेत्र की पानी के नीचे होने की संभावना है और इसका कारण होगा जलवायु परिवर्तन।

अध्ययन से पता चलता है कि यदि ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन पर अंकुश नहीं लगाया गया तो 2100 तक 90% समुद्री प्रजातियों के विलुप्त होने का खतरा है। 

भूमि उपयोग

पशु उद्योग अरबों जानवरों को खाना खिलाने के लिए खेती करता है और खेती करने के लिए बड़े पैमाने पर जमींन का इस्तेमाल किया जाता है। 

सभी भूमि जो फसलों के लिए उपयुक्त है, पशु उद्योग इसका 1/3 भाग पशु चारा उगाने के लिए करता है। पृथ्वी पर 1/4 बर्फ मुक्त भूमि पर खेती वाले जानवरों का कब्जा है, वे अमेज़ॅन जंगलों के 91% विनाश के लिए पूरी तरह से जिम्मेदार हैं।

यह गणना की जाती है कि एक शाकाहारी को एक वर्ष में खुद को खिलाने के लिए लगभग 1/6 एकड़ भूमि की आवश्यकता होती है जबकि एक माँस खाने वाले को 18 गुना अधिक भूमि की आवश्यकता होती है।

भूमि उपलब्ध कराने के लिए करोड़ों पेड़ों को काट दिया जाता है, यदि पेड़ ही नहीं बचेंगे तो कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा पृथ्वी पर और भी अधिक हो जाएगी जो कि जलवायु परिवर्तन को और तेज़ कर सकता है। 

अध्ययनों ने अनुमान लगाया है कि हर सेकंड, एक एकड़ जंगल नष्ट हो जाता है। क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि जब तक आप इस ब्लॉग को पढ़ चुके होंगे तब तक कितनी एकड़ जमीन खत्म हो जाएगी?

पानी

पशु उद्योग जानवरों को पालने, खिलाने, और काटने के लिए दुनिया के 20% ताजा पानी का इस्तेमाल करता है। हम एक बड़े संकट से गुजर रहे हैं और जनता को सही विकल्प चुनने के लिए शिक्षित करने की आवश्यकता है। भविष्य में ताजा पानी का संकट हम इंसानों के साथ ही सभी जानवरों को भी भुगतना पड़ सकता है।

The Guardian’ के अनुसार 1 किलो गेहूँ का उत्पादन करने के लिए 500-4000 लीटर पानी लगता है, 1 किलो माँस का उत्पादन करने के लिए 5000-20000 लीटर पानी लगता और प्रति लीटर दूध उत्पादन के लिए 1250 लीटर पानी का इस्तेमाल होता है। ये संख्या स्पष्ट करती है कि पौधे आधारित आहार चुनना हमारी जिम्मेदारी है और जल संसाधन को बचाने का एकमात्र तरीका है।

समुदायों पर प्रभाव

पशु खेती भी दुनिया में हो रही भुकमरी के लिए जिम्मेदार है। 1 अरब लोग हर रात भूखे सोते हैं, हमारे ग्रह पर 10 अरब लोगों को खिलाने के लिए पर्याप्त भोजन है लेकिन दुनिया का 50% अनाज हमारे पशु उद्योग के जानवरों द्वारा खाया जाता है। एक दिन में इंसानों की मौजूदा आबादी लगभग 21 अरब पाउंड खाना खाती है जबकि पशु उद्योग की गाय अकेले करीब 135 अरब पाउंड का उपभोग करती हैं। अंत में इसका खामियाजा समाज के गरीब तबके को भुगतना पड़ता है।

इतना ही नहीं बल्कि इन पशुपालन संयंत्रों के आसपास रहने वाले समुदायों को अत्यधिक नुकसान उठाना पड़ता है। खाद के गड्ढों से निकलने वाली जहरीली गैसों में किसी व्यक्ति को मारने की क्षमता होती है क्योंकि उनमें ‘घातक तंत्रिका विष’ – हाइड्रोजन सल्फेट, अमोनिया, नाइट्रस ऑक्साइड, कार्बन डाइऑक्साइड और अन्य जहरीली गैसें होती हैं। यह अस्थमा पैदा कर सकता है, वृद्ध लोगों और बच्चों को समान रूप से प्रभावित करने वाले मस्तिष्क के ऊतकों को नष्ट कर सकता है, और समय से पहले मौत का कारण भी बन सकता है।

पशु उद्योग के जानवर प्राकृतिक तरीके से पैदा नहीं होते हैं बल्कि जबरदस्ती इनको पैदा किया जाता है ताकि पशु उद्योग इनसे मुनाफ़ा कमा सके और हम सभी पशु पदार्थ भोग सकें। 

समस्या का समाधान क्या है?

जलवायु परिवर्तन, जल संकट, भूमि की कमी, समुदायों पर प्रभाव इन सभी समस्या को बढ़ाने के सबसे बड़े कारणों में से एक है पशु उद्योग। समस्या का समाधान भी यही है कि पशु उद्योग में चल रही पशु खेती को रोका जाए और यह तभी सम्भव है जब हम सभी पशु उत्पाद का त्याग कर वनस्पति आधारित उत्पाद को अपनी जीवनशैली का हिस्सा बनाएंगे। 

कार्बन एक ग्रीनहाउस गैस है जो कि पृथ्वी के तापमान को बढ़ाने का काम करता है। अगर हम कम से कम कार्बन का उत्सर्जन करें तो जलवायु परिवर्तन को धीमा किया जा सकता है। एक व्यक्ति की वजह से उसके पूरे जीवनकाल में जितने कार्बन का उत्सर्जन होता है उसे कार्बन फुटप्रिंट कहते हैं यानी आपकी वजह से जितना कार्बन उत्सर्जन हुआ वह आपका कार्बन फुटप्रिंट है। 

जलवायु परिवर्तन की वजह से पृथ्वी का कुछ नहीं बिगड़ेगा विनाश तो हम सभी जीवों का होगा। इसलिए अपने कार्बन फुटप्रिंट को कम से कम रखें ताकि जलवायु परिवर्तन से होने वाले प्रभावों जैसे – गर्म हवाओं, असंतुलित पर्यावरण, सूखा, बाढ़, तूफान इत्यादि मुसीबतों से बच सकें। 

कार्बन फुटप्रिंट को कम से कम रखने के लिए ऐसे उत्पादों का उपभोग न करें या कम से कम करें जिससे कार्बन उत्सर्जन होता है जैसे – दूध, माँस, चमड़ा, ऊन, रेशम इत्यादि।

जरुरी लेख :

वीगनवाद, आध्यात्मिकता का एक स्वाभाविक परिणाम है। (2023)

निष्कर्ष 

यदि इसी रफ़्तार से जलवायु परिवर्तन होता रहा तो वह दिन दूर नहीं जब हमें प्रकृति के विनाश को अपनी आँखों के सामने होते देखना और झेलना पड़ेगा। इसलिए यह जरुरी है कि पशु उत्पाद जिसकी वजह से बड़ी मात्रा में ग्रीनहॉउस गैस का उत्सर्जन होता है उसका त्याग कर वनस्पति आधारित विकल्प का इस्तेमाल करें। 

कार्बन फुटप्रिंट को कम से कम रखने से जलवायु परिवर्तन को धीमा किया जा सकता है और निर्दोष पशुओं और इंसानों को बचाया जा सकता है। पृथ्वी को बचाएँ, क्यूंकि हमारे पास एक मात्र विकल्प यही है। 

स्त्रोत:

https://www.weforum.org/agenda/2019/02/chart-of-the-day-this-is-how-many-animals-we-eat-each-year/

https://www.ucdavis.edu/food/news/making-cattle-more-sustainable#:~:text=The%20global%20problem&text=Livestock%20are%20responsible%20for%2014.5%20percent%20of%20global%20greenhouse%20gases.

https://www.theguardian.com/commentisfree/2017/dec/04/animal-agriculture-choking-earth-making-sick-climate-food-environmental-impact-james-cameron-suzy-amis-cameron

https://www.un.org/sustainabledevelopment/climate-change/

https://mumbaimirror.indiatimes.com/mumbai/civic/mumbai-could-go-under-water-by-2050/articleshow/71828867.cms

https://www.downtoearth.org.in/news/economy/quick-facts-about-the-world-s-livestock-economy-54826#:~:text=Livestock%20is%20the%20largest%20user,used%20to%20grow%20feed%20crops.

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