वीगनवाद एक ऐसा अहिंसक दर्शन है जो सम्पूर्ण प्राणियों के हित में काम करता है। अध्यात्म से ही अहिंसा का अंकुर फूटता है और वीगनवाद दर्शन का उदय होता है। लोग अध्यात्म को सिर्फ पूजा पाठ, हवन, पहाड़ों और जंगलो में समाधि समझते हैं लेकिन यह मान्यता अधूरी है। इस लेख में हम यह समझेंगे कैसे वीगनवाद, आध्यात्मिकता का एक अभिन्न अंग और स्वाभाविक परिणाम है? 

आज हमारी लापरवाह जिंदगी का परिणाम हर साल 8000 करोड़ से भी अधिक पशुओं को भुगतना पड़ रहा है, प्रतिदिन करोड़ों जानवर सिर्फ इसलिए मारे जाते हैं ताकि हम पशु पदार्थ जैसे – दूध, दही, मांस, चमडा, शहद, ऊन इत्यादि का उपभोग कर सकें। हालाँकि हम वनस्पति आधारित पदार्थ का इस्तेमाल पशु पदार्थ के जगह पर कर सकते हैं लेकिन हमारी अज्ञानता, लालच और अंधी उपभोग की आदत ने हमें करोड़ों पशुओं की हत्या का जिम्मेदार बना दिया है।

तो फिर पशु हत्या को रोकने का तरीका क्या है? 

वीगनवाद पशु हत्या को रोकने का सबसे अच्छा तरीका है। वीगन जीवनशैली को अपनाकर हम पशु शोषण और क्रूरता का अंत कर सकते हैं। 

वीगन कौन है और वीगनवाद क्या है?

अपने खानपान से लेके जीने मे, किसी भी संवेदनशील पशु के वस्तुकरण और उनसे बने उत्पाद से निषेध को ‘वीगनवाद’ कहते है। वीगनवाद एक अहिंसक दर्शन है और इसे जीने वालो को ‘वीगन’ कहते है।

ऐसे कई लोग हैं जो की रुझान के साथ चलते हैं और शौक के लिए वीगन हैं चूँकि जिंदगी के प्रति कोई ज्ञान और बोध नहीं होता है ऐसे में उनका वीगनवाद भी सफल नहीं हो पाता है, और कुछ लोग खुद को वीगन कहते हैं लेकिन सिर्फ कुछ प्राणियों के प्रति सदभावना रखते हैं बाकियों के प्रति नहीं।
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जिसके जीवन में बोध नहीं है वह किसी भी जानवर के प्रति पूरी तरह अहिंसक नहीं हो सकता है। 

तो फिर सवाल यह है की पूर्ण रूप से वीगन कौन है? 

सरल अर्थों में कहूँ तो जो व्यक्ति अध्यात्म से जुड़ा है वही पूर्ण वीगन है क्यूंकि ऐसे व्यक्ति का नजरिया सिर्फ कुछ जानवरों के प्रति नहीं बल्कि सम्पूर्ण विश्व और जिंदगी के प्रति बोध, करुणा और अहिंसा से भर जाता है। 

वीगनवाद बहुत ऊँची बात है लेकिन शर्त यह है की वीगनवाद आपके बोध से उठना चाहिए सिर्फ रुझान से नहीं क्यूंकि रुझान के लिए उठाया हुआ कदम कहीं नहीं जा सकता है। 

जिनका वीगनवाद करुणा और बोध से उठता है वे लोग जाने – अनजाने अध्यात्मिक अवश्य होते हैं। 

अध्यात्म क्या है?

अध्यात्म का अर्थ है, ईमानदारी से अपने मन के अहम् भाव यानी खुद (अपने आप) को समझना। अध्यात्म कोई मान्यता नहीं है बल्कि यह सभी प्रकार की मान्यताओं को गहराई से समझने के लिए कहता है ताकि पता चल सके की मान्यता कहाँ से आया था और उस समय मान्यता का क्या फायदा था। अध्यात्म आपको बताता है की आप एक चेतना हैं जिसके पास समझने की क्षमता है। 

अध्यात्म कहता है की अपने कर्मों को देखों वह कहाँ से उठ रहा है, और जब हम अपने कर्मों को देखते हैं तो हमें यह समझता है की यह हमारे विचार से उठ रहा है और जो बोध में नहीं जी रहा है उसके लगभग सभी विचार बाहर से ही आते हैं इसी तरह जब हम पशु पदार्थ का उपभोग करते हैं तो हमें इसकी आदत लगाई गयी होती है। 

जब हमारे मन को बोध होता है तो उसमे करुणा भी जागृत होती है, करुणा यानी दूसरों को कष्ट और पीड़ा से आजाद करना। फिर करुणा से ही अहिंसा भी जागृत होती है जिसका अर्थ है किसी भी प्राणी के साथ हिंसा न करना। 

अब जिस व्यक्ति के मन में बोध, करुणा, और अहिंसा है वह किसी अन्य प्राणियों के प्रति हिंसक और क्रूर नहीं होता है तब वह न ही पशु उत्पाद का भोग करता है और न ही अपने खातिर जानवरों का शोषण करता है, यही है पूर्ण वीगनवाद। इसलिए वीगनवाद, आध्यात्मिकता का एक स्वाभाविक परिणाम है। 

बस मन को यह समझना होता है की उसके अंदर जितनी भी वृत्तियाँ हैं काम, क्रोध, इच्छा, डर, लोभ, मोह ये सब प्रकृति ने हम जीवों के भौतिक अस्तित्व को लगातार चलते रहने के लिए दिया है, लेकिन ये सभी वृत्तियाँ मन की नहीं है बस मन उससे जुड़ जाता है इसलिए मन को लगता है की वह मैं हूँ लेकिन ऐसा नहीं है।  

जब मन को बोध हो जाता है तो वह सही कर्मों का चयन करता है और इन्हीं एक कामों में से एक है वीगनवाद। जो व्यक्ति अध्यात्म की वजह से वीगन है वह दुनिया के बदलने पर भी नहीं बदलता है।

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